पेपर लीक से लेकर E20 तक... आखिर क्यों हिल गई सरकार? अंदर की सचाई!
देश के अलग-अलग जगह में इतने प्रोटेस्ट हो रहे थे दिल्ली मुंबई और पाटना में यह हो क्यों रहे है
क्या सिर्फ ये धर्मेन्द्र प्रधान की वजह से हो रहे है या इनके पीछे और भी करना है ।
हमने देखा है हमरे देश में पेपर लीक होते रहते है और गलत है लेकिन अब तक हमने देखा था पेपर लीक बच्चे आवाज उठाते थे पेपर दोबारा होते थे जिन्होंने पेपर लीक किया वो पकड़े जाते थे, में मानता हूँ यह किसी भी student के लिए frustrating है लेकिन इस पर जायदा लोग ध्यान नहीं देते यह मुद्दा इतना बड़ा नहीं होता था जिस पर हर कोई अपना काम छोड़ कर इस पर करे यह सिर्फ student का मुद्दा होता था अब यह मुद्दा इतना बड़ा केसे बन गया जिस ने प्रधानमंत्री तक को हिला दिया जिस वजह से मजबूर हो कर धर्मेन्द्र प्रधान को RESIGNS देना पडा।
cjp प्रोटेस्ट इतना बड़ा क्यों बना?
देखिए अभी का time ऐसा है हर कोई frustrated हो चुका है नौकरी करने वाला काम sellry खर्च जायदा student paper लीक से गाड़ी चलने वाला e20 से परेसान युवा पढ़ने के बाद भी बेरोजगार मीडिया की fake news से परेसान
पुलिस के रिश्वत ले और गलत वहवार से परेसान और फिर आप को पता ही है कितने केस padding है कोई अमीर कीसी को भी टक्कर मार कर चला जाता है उस को कितनी आसानी से छोड दिया जाता है।
सैलरी काम और ज्यादा
भारत के अधिकांश राज्यों में Unskilled और Semi-skilled श्रमिकों के लिए Minimum Wages ही लगभग ₹11,000 से ₹15,000 प्रति माह है। कहीं पर काम या जायदा हो सकता है। इन सब लोगो को company ठेकेदारी में रखती है जिनको कभी भी निकाला जा सकता है इनको el या cl भी नहीं मिलती कम्पनीयो में बहुत कम लोग company से होते है जिनको काफी साल हो गये हों इसके लिए सब company का अलग रूल होता है कुछ कंपनी वर्कर को time पूरा होने से पहले ही ब्रेक दे देती है 2 से 3 महीने का उसको फिर नये तरीके से काम पर रख लेती है ।
काम केसा होता है ये बताने की ज़रूरत नहीं आप सभी जानते है और व्यहवार केसे होता है ये भी आप को पता है
लेकिन कुछ company के मालिक अछे होतै जो जब आते है व्रकरो से बात करते है हाथ मिलाते है।
पेपर लीक
अगर पिछले कुछ सालों का कच्चा-चिट्ठा खोलकर देखें, तो आंकड़े देखकर सच में दुख होता है कि हमारे सिस्टम में युवाओं के भविष्य के साथ कैसे खिलवाड़ हो रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स, इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट्स जैसे OSINT डेटा और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, एक मोटे तौर पर हिसाब लगाया जाए तो पिछले 5 सालों में देश के अंदर 65 से ज्यादा बड़ी परीक्षाओं के पेपर लीक होने के मामले सामने आ चुके हैं। इनमें सिर्फ छोटे-मोटे एग्जाम नहीं, बल्कि देश के सबसे बड़े एंट्रेंस और रिक्रूटमेंट एग्जाम भी शामिल हैं।
- एक अनुमान के मुताबिक पिछले 5 सालों में लगभग 65 से ज्यादा ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें एफआईआर दर्ज हुई, जांच बैठी या एग्जाम रद्द करने पड़े।
- इनमें से करीब 45 से ज्यादा एग्जाम तो सीधे तौर पर अलग-अलग विभागों में सरकारी नौकरियों के थे। इसकी वजह से 3 लाख से ज्यादा सरकारी पदों की भर्तियां या तो रद्द करनी पड़ीं या अनिश्चितकाल के लिए टालनी पड़ीं।
- इसमें नीट (NEET-UG), यूजीसी-नेट (UGC-NET), सीटेट (CTET), जेईई (JEE Mains) जैसी देश की बड़ी राष्ट्रीय परीक्षाएं भी शामिल हैं, जिनका दायरा राष्ट्रीय स्तर पर था।
ये सब कहां-कहां हुआ?
पेपर लीक की यह बीमारी लगभग आधे से ज्यादा देश में फैल चुकी है, लेकिन कुछ राज्य इसमें सबसे आगे रहे हैं:
- उत्तर प्रदेश (UP): पिछले कुछ सालों में यहां सबसे ज्यादा लगभग 8 से ज्यादा बड़े पेपर लीक या धांधली के मामले सामने आए (जैसे यूपी पुलिस सिपाही भर्ती परीक्षा, RO/ARO परीक्षा आदि)।
- राजस्थान और महाराष्ट्र: इन दोनों राज्यों में भी लगभग 7-7 बड़े पेपर लीक के मामले दर्ज किए गए (जैसे राजस्थान की रीट-REET परीक्षा और पटवारी/वनरक्षक परीक्षाएं)।
- बिहार: यहाँ पिछले कुछ वर्षों में लगभग 6 बड़े पेपर लीक और प्रश्नपत्र वायरल होने की घटनाएं सामने आईं (बीपीएससी और नीट से जुड़े मामले)।
- गुजरात और मध्य प्रदेश: इन राज्यों में भी 4-4 से ज्यादा बार पेपर लीक के बड़े झटके छात्रों को लगे (मध्य प्रदेश का व्यापम और उसके बाद के कुछ अन्य मामले)।
- इसके अलावा हरियाणा, झारखंड, उत्तराखंड, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना जैसे राज्यों में भी पुलिस भर्ती, शिक्षक भर्ती या जूनियर इंजीनियर के पेपर लीक होने की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं।
कितने लोग पकड़े जाते हैं?
जब भी कोई बड़ा पेपर लीक होता है, तो सरकार और पुलिस की तरफ से ताबड़तोड़ एक्शन की खबरें आती हैं:
- गिरफ्तारियां: पुलिस हर बार छोटे स्तर पर कार्रवाई करती है। सॉल्वर गैंग के मेंबर, परीक्षा केंद्रों के कर्मचारी, प्रिंटिंग प्रेस के लोग, और कभी-कभी छोटे-मोटे मास्टरमाइंड समेत सैकड़ों से लेकर हजारों लोगों (अलग-अलग राज्यों की एसआईटी और सीबीआई जांच में) को गिरफ्तार किया जाता है।
- पकड़े जाने का सच: सच तो यह है कि पुलिस उन दलालों, एजेंटों और सॉल्वर गैंग के गुर्गों को तो पकड़ लेती है जो नीचे नेटवर्क चला रहे होते हैं। लेकिन असली मास्टरमाइंड या इस पूरे सिंडिकेट की जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि कई बार मुख्य सरगना कानून की पकड़ से बाहर या बहुत बाद में लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद सामने आते हैं।
- सजा : सबसे बड़ी विडंबना यह है कि गिरफ्तारियां तो तुरंत हो जाती हैं, लेकिन भारत की न्याय प्रणाली में लंबी कानूनी प्रक्रिया और गवाहों-सबूतों के आभाव के चलते बहुत कम मामलों में दोषियों को उम्रकैद या भारी सजा मिल पाती है। ज्यादातर मामलों में आरोपी कुछ समय बाद जमानत पर बाहर आ जाते हैं और छात्र वहीं के वहीं खड़े रह जाते हैं। हमारे देश में पिछले 5 सालों में पेपर लीक की समस्या एक बहुत बडा मुद्दा रही है . कई बड़े सेंट्रल और state-level exams के पेपर लीक होने की घटनाएं सामने आयी है, जिससे करोड़ों युवाओं का भविष्य प्रभावित हुआ है.
E20 से परेशान लोग
किसी आम इंसान या मिडल कलश के लिए गाड़ी खरीदना एक स्पेशल moment होता है:
- मानसिक और वित्तीय तैयारी (3 से 5 साल): एक मिडिल क्लास इंसान अपनी पहली नई कार या बाइक खरीदने से पहले कम से कम 3 से 5 साल तक मन बनाता है। हर महीने थोड़ा-थोड़ा पैसा जोड़कर डाउन पेमेंट (Down Payment) के लिए 1 से 2 लाख रुपये (कार के लिए) इकट्ठा करता है।
- बचत और काम मे गुजारा: इस दौरान परिवार अपने कई शौक मारता है, शादियों या त्योहारों के खर्चों में कटौती करता है।
लोग गाड़ी की किस्त (EMI) कैसे भरते हैं?
जब गाड़ी घर आ जाती है, तो असली इम्तिहान शुरू होता है। ईएमआई भरना किसी जंग से कम नहीं होता:
- नौकरी या काम का दबाव: लोग इस डर से और ज्यादा मेहनत करते हैं, ओवरटाइम करते हैं या बॉस की डांट चुपचाप सहते हैं कि "अगर नौकरी छूटी या काम मंदी में गया, तो बैंक वाले आकर गाड़ी खींचकर ले जाएंगे।
- इस लिए लोग EMI भी ज्यादा करवाते है जिस से उनकी sellry पर ज्यादा लोड ना पडे इस वजह से लोग EMI में लंबे समय के लिए बंध जाते है।
गाड़ी को बच्चे की तरह संभालत कर रखते हैं।
जब कोई इंसान अपनी गाढ़ी कमाई का एक-एक रुपया जोड़कर और सालों की ईएमआई के बोझ तले दबकर गाड़ी खरीदता है, तो वह उसे लोहे का डिब्बा नहीं, अपने परिवार के सदस्य की तरह देखता है:
- खरोंच लगते ही दिल बैठ जाता है: ट्रैफिक में अगर कोई बाइक वाला हल्का सा भी टच कर दे, तो ऐसा लगता है जैसे सीने पर हाथ रख दिया हो। लोग गाड़ी पर ज़रा सी खरोंच आते ही तुरंत डेंटर-पेंटर के पास भागते हैं।
- खान-पान का खास ख्याल (सर्विसिंग): समय पर इंजन ऑयल बदलना, ऑथराइज्ड सर्विस सेंटर की जगह अपने भरोसेमंद मैकेनिक से गाड़ी की ट्यूनिंग कराना, और अब तो E20 पेट्रोल के आने के बाद लोग योजक (Additives) या अच्छी क्वालिटी का फ्यूल डलवाने लगे हैं ताकि इंजन जल्दी खराब न हो।
- साफ-सफाई और रखरखाव: हर रविवार को सुबह उठकर गाड़ी धोना, उसके इंटीरियर को चमकाना, और पार्क करते वक्त हमेशा ऐसी जगह ढूंढना जहां धूप सीधे न पड़े या कोई दूसरी गाड़ी ठोक न जाए—यह हर मिडिल क्लास गाड़ी मालिक का डेली रूटीन है।
सच कहें तो, गाड़ी किसी भी मिडिल क्लास परिवार के लिए संघर्ष, सफलता और इमोशन का एक बहुत बड़ा टुकड़ा होती है, जिसे वह अपनी जान से ज्यादा संभालकर रखता है।
टीवी चैनल और fake न्यूज से परेसान लोग #Godi media
आज के समय में मीडिया और विशेषकर टीवी न्यूज़ को लेकर लोगों के मन में जो गुस्सा और निराशा है, वह किसी से छिपी नहीं है। 'गोदी मीडिया' या 'फेक न्यूज़' जैसे शब्द आज आम बोलचाल का हिस्सा बन चुके हैं, और इसके पीछे एक बहुत बड़ी और कड़वी सच्चाई है।
आइए बिना किसी लाग-लपेट के, बिल्कुल खुलकर बात करते हैं कि आज टीवी मीडिया का यह हाल क्यों हो गया है और इसके पीछे की असलियत क्या है:
1.टीआरपी (TRP) का खेल और सनसनीखेज खबरें
आज के दौर में टीवी चैनलों का मुख्य मकसद लोगों को सही और सटीक जानकारी देना नहीं, बल्कि TRP बटोरना रह गया है।
- जो बिकता है, वही दिखता है': चैनलों को समझ आ गया है कि गंभीर मुद्दों (जैसे बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई) पर डिबेट करने से दर्शक चैनल बदल देते हैं।
- इसके उलट, अगर रोजाना शाम को कोई सनसनीखेज बहस (कंट्रोवर्सी), धर्म, या नफरت फैलाने वाले मुद्दे पर बात की जाए, तो लोग टीवी से चिपक जाते हैं। यही वजह है कि आज की पत्रकारिता डिबेट नहीं, बल्कि अखाड़ा बन चुकी है।
सत्ता और मीडिया की सांठगांठ ('गोदी मीडिया' का मतलब)
'गोदी मीडिया' शब्द का इस्तेमाल उन मीडिया घरानों के लिए किया जाता है जिन पर आरोप है कि वे सरकार की आलोचना करने से डरते हैं या बचते हैं।
- सवालों की जगह तारीफ: लोकतंत्र में मीडिया को 'चौथा स्तंभ' (Fourth Estate) कहा जाता है, जिसका काम सरकार से कड़े सवाल पूछना और जनता की आवाज उठाना है। लेकिन आज कई बड़े चैनल सत्ता से सवाल पूछने के बजाय उनका प्रचार करते नजर आते हैं।
- दबाव और फंडिंग: बड़े मीडिया हाउसों को चलाने वाले उद्योगपतियों के राजनीतिक और व्यावसायिक संबंध होते हैं। इसके चलते स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता या तो पीछे छूट गई है या फिर उसे आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया गया है।
fake न्यूज़ और प्रोपेगेंडा की फैक्ट्रियां
सोशल मीडिया के इस दौर में टीवी चैनलों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बिना जांचे-परखे खबरें परोसी जाती हैं।
- एजेंडा सेट करना: किसी खास समुदाय, पार्टी या व्यक्ति को टारगेट करने के लिए आधे-अधूरे सच या मनगढ़ंत वीडियो दिखाए जाते हैं।
- जब एक बार कोई झूठ टीवी पर चल जाता है, तो करोड़ों लोग उसे सच मान लेते हैं—चाहे बाद में चैनल उस पर छोटा सा खंडन ही क्यों न छाप दे। नुकसान तब तक हो चुका होता है।
इसका आम जनता पर क्या असर पड़ता है?
इस तरह की पक्षपातपूर्ण और झूठी पत्रकारिता का सबसे बड़ा शिकार आम जनता होती है:
- समाज में दूरी: लोग अब मुद्दों पर नहीं, बल्कि विचारधाराओं के आधार पर एक-दूसरे के दुश्मन बनते जा रहे हैं। नफरत और ध्रुवीकरण (Polarization) समाज की नींव को खोखला कर रहा है।
- असली मुद्दे गायब: देश में असली समस्याएं—जैसे युवाओं के पास नौकरियां न होना, किसानों की मुश्किलें, और बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं—टीआरपी की इस अंधी दौड़ में कहीं छिप जाती हैं।
आज स्थिति यह है कि देश का एक बहुत बड़ा वर्ग मुख्यधारा के टीवी चैनलों पर भरोसा करना छोड़ चुका है। लोग अब सच जानने के लिए स्वतंत्र पत्रकारों, वैकल्पिक डिजिटल मीडिया या जमीनी रिपोर्ट्स की तलाश करते हैं। यह इस बात का सबूत है कि जनता अब इस प्रोपेगेंडा को समझने लगी है।
पुलिस द्वारा रिश्वत मांगना और नागरिकों के साथ गलत व्यवहार करना
पुलिस का काम कानून व्यवस्था बनाए रखना, जनता की सुरक्षा करना और न्याय दिलाना होता है। लेकिन जब वही रक्षक भक्षक बन जाए—यानी घूस (रिश्वत) लेना शुरू कर दे और आम नागरिकों के साथ बदसलूकी या मारपीट करे—तो सिस्टम से पूरा भरोसा उठ जाता है।
आइए इस कड़वी सच्चाई पर बिल्कुल खुलकर और बेबाक बात करते हैं कि थानों और सड़कों पर यह सब कैसे चलता है और इसका आम इंसान पर क्या असर पड़ता है:
1. रिश्वतखोरी का खेल
थाने से लेकर चौराहे तक, घूसखोरी आज एक ऐसा नासूर बन चुकी है जिसे लोग धीरे-धीरे सिस्टम की मजबूरी मानकर स्वीकार करने लगे हैं।
- चौराहों पर चेकिंग के नाम पर लूट: ट्रैफिक पुलिस या सामान्य पुलिस चेकिंग के नाम पर छोटे-छोटे दुकानदारों, डिलीवरी लड़कों या बाइक चालकों को रोककर कागजों के नाम पर पैसे ऐंठती है।
- एफआईआर (FIR) दर्ज कराने के लिए भी कीमत: कई थानों में आज भी स्थिति यह है कि अगर कोई अपनी शिकायत लेकर जाए, तो पुलिस पहले रिपोर्ट लिखने के नाम पर या तो टालमटोल करती है या फिर पैसे मांगती है। "साहब, कागज आगे भेजने होंगे, चाय-पानी का खर्चा लगेगा"—यह वाक्य हर दूसरे थाने में आम सुनने को मिलता है।
- दबाव डालकर समझौता कराना: कई मामलों में पैसे लेकर अपराधियों को छोड़ दिया जाता है या पीड़ित पर ही दबाव बनाया जाता है।
2. नागरिकों के साथ गलत व्यवहार और दबंगई
वर्दी का नशा जब सिर चढ़कर बोलता है, तो पुलिस भूल जाती है कि वह जनता की सेवा के लिए है।
- गाली-गलौज और मारपीट: अगर कोई गरीब, मजदूर या आम आदमी थाने में अपनी समस्या लेकर चला जाए, तो उसके साथ ऐसा बर्ताव किया जाता है मानो वह कोई बहुत बड़ा अपराधी हो। बिना जांचे-परखे थप्पड़ मारना, गंदी गालियां देना और डराना-धमकाना आम बात हो गई है।
- वर्दी की हनक': रुतबे और पावर का ऐसा गलत इस्तेमाल किया जाता है कि कमजोर वर्ग का इंसान अपनी इज्जत बचाने के लिए पुलिस के सामने हाथ जोड़ने पर मजबूर हो जाता है। उसे पता होता है कि अगर आवाज उठाई, तो झूठे केस में फंसा दिए जाएंगे।
3. ऐसा क्यों होता है?
- ऊपर तक का चैनल: पुलिस विभाग में निचले स्तर पर अक्सर यह चर्चा होती है कि पोस्टिंग या थाने का चार्ज पाने के लिए ऊपर तक पैसे देने पड़ते हैं। जब नीचे वाले को अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं, तो वह जनता को लूटकर अपनी लागत वसूलता है।
- जवाबदेही की कमी: पुलिस विभाग की आंतरिक जांच (Internal Inquiry) अक्सर लीपापोती साबित होती है। पुलिस वाले अपने ही विभाग के दोषी कर्मचारी को बचाने की कोशिश करते हैं, जिससे उनका हौसला और बढ़ जाता है।
4. आम नागरिक पर इसका क्या असर पड़ता है?
- कानून से डर नहीं, खौफ पैदा होता है: एक स्वस्थ समाज में पुलिस का खौफ अपराधियों के दिल में होना चाहिए, लेकिन आज के समय में शरीफ और आम आदमी पुलिस के नाम से डरता है। लोग थाने जाने से कतराते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि न्याय मिलने से पहले उनका मानसिक और आर्थिक शोषण होगा।
- व्यवस्था से बगावत की भावना: जब इंसान हर तरफ से ठगा जाता है और पुलिस भी उसकी मदद करने के बजाय उसे नोचती है, तो उसका सिस्टम और कानून से विश्वास उठ जाता है।
पुलिस विभाग में कुछ ईमानदार अफसर भी होते हैं जो वाकई अपनी ड्यूटी पूरी ईमानदारी से निभाते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार और नागरिकों के साथ गलत व्यवहार के कारण उनके अच्छे काम को दबा दिया है। जब तक पुलिस को जनता का 'सेवक' मानकर जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा और भ्रष्ट अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक आम आदमी यूं ही पिसता रहेगा।
कछुआ भी शर्मा जाए, भारतीय अदालतों की रफ्तार देख कर
कोर्ट (न्यायपालिका) में मुकदमों का अंबार और न्याय मिलने में होने वाली भयंकर देरी, आज के समय में देश की सबसे बड़ी विडंबना बन चुकी है। दूसरी तरफ, अमीरजादों या रसूखदार लोगों द्वारा गाड़ी से कुचलकर भाग जाने (Hit and Run) और पुलिस-प्रशासन द्वारा पैसे या दबाव में आकर मामला रफा-दफा कर देने की बात पर तो सच में दिल बैठ जाता है।
आइए इस पूरी कड़वी सच्चाई पर बिल्कुल खुलकर बात करते हैं कि अदालतों का हाल क्या है और यह रसूखदारों वाला खेल कैसे चलता है:
1. कोर्ट में पेंडिंग केस
अगर देश की अदालतों के आंकड़ों को देखें, तो स्थिति बेहद डरावनी है:
- करोड़ों मामले लंबित: भारत की विभिन्न अदालतों (सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और जिला/अधीनस्थ अदालतों) में कुल मिलाकर 5 करोड़ से ज्यादा केस पेंडिंग (लंबित) पड़े हैं।
- तारीख पर तारीख': अगर कोई आम आदमी अदालत का दरवाजा खटखटाय,“न्याय” पाने के लिए सालों-साल, बल्कि कई बार पुश्तैनी वक्त निकल जाता है। एक छोटी सी तारीख मिलने में महीनों लग जाते हैं।
- वजह: जजों की भारी कमी, बुनियादी ढांचे की कमी और कई बार जानबूझकर वकीलों द्वारा केस को खींचना—इन सबकी वजह से आम आदमी न्याय की उम्मीद में बूढ़ा हो जाता है।
2. अमीर लोगों के लिए कानून
जब कोई रसूखदार या पैसे वाला शख्स अपनी तेज रफ्तार लग्जरी गाड़ी से किसी गरीब, मजदूर या राहगीर को टक्कर मारकर भाग जाता है, तो कानून और न्याय का मजाक कैसे बनता है, यह किसी से छिपा नहीं है:
- पैसे और पावर का खेल: एक्सीडेंट के तुरंत बाद ड्राइवर को सामने कर दिया जाता है (जो असली मालिक नहीं होता), या फिर थाने में ही सेटिंग हो जाती है। रसूखदार लोग अपने पैसों और राजनीतिक रसूख के दम पर पुलिस को मैनेज कर लेते हैं।
- सफेद कागज पर साइन या मुचलका: कई बार गरीबों या मजबूर परिवारों को पैसों का लालच देकर या डरा-धमकाकर उनसे सादे कागज पर या हलफनामे पर साइन करवा लिए जाते हैं कि "हम समझौता करना चाहते हैं" या "यह हमारी ही गलती थी।
- मामला रफा-दफा: कुछ ही घंटों या दिनों में आरोपी जमानत पर बाहर आ जाता है, और उस गरीब परिवार की चीखें कागजों की फाइलों में कहीं दबकर रह जाती हैं। पुणे का पोर्श (Porsche) कार कांड या ऐसे ही कई अन्य हाई-प्रोफाइल मामले इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं, जहां शुरुआत में रसूखदारों को बचाने की पूरी कोशिश की जाती है।
3. कानून और सिस्टम की दोहरी चाल
- आम आदमी के लिए डंडा, खास के लिए रेड कारपेट: अगर कोई गरीब गलती से कोई छोटी-सी गलती कर दे, तो पुलिस उसे ऐसे पीटती है जैसे कोई बहुत बड़ा आतंकवादी हो। लेकिन जब कोई अमीर शराब के नशे में गाड़ी चलाकर किसी की जान ले ले, तो उसे बचाने के लिए बड़े-बड़े वकील और सिस्टम के लोग खड़े हो जाते हैं।
- इंसाफ का मजाक: जब जनता यह देखती है कि पैसे वाला इंसान किसी को कुचलकर भी खुलेआम घूम रहा है और गरीब को न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है, तो कानून से से उसका भरोसा पूरी तरह उठ जाता है।
यह देश की व्यवस्था का सबसे काला सच है, जहां कानून की आँख पर पट्टी बंधी है, और कई बार तराजू पैसे और ताकत के जोर पर झुक जाता है।
आप को यह आर्टिकल केसा लगा comment मे अपनी राय जरूर देना हो सकता है आप को मेरी बात अच्छी ना लगी हो तो इसको मेरी पार्सल राय समझ कर भूल जाना इसको दिल पर लेने की जरूरत नही है मेरा कीसी को अपमानित करने का कोई इरादा नहीं है धन्यवाद!
लेखक: Ankit Kumar



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