Only 15% to 20% of dogs survive beyond three months—the full truth behind this. ( हिन्दी, English)

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why street dogs eating poop ?




 कुत्ते हमारे साथ सदियों से हैं। जब हमारे पूर्वज जंगल में कबीलों में रहते थे, उस समय आज के कुत्तों के पूर्वज भेड़िये रहे होंगे, जिन्हें इंसानों ने शिकार करने में मदद के लिए साथ रख लिया होगा। इवोल्यूशन के कारण वो भेड़िये कुत्ते बन गए और उन्होंने पूरी तरह से इंसानों को अपना लिया।

​शायद यही उनकी सबसे बड़ी गलती थी।


​सड़कों पर दम तोड़ती मासूमियत (मेरा अनुभव)

यह बात मैं किसी इंटरनेट डेटा या AI की रिपोर्ट के आधार पर नहीं कह रहा, यह मेरा पर्सनल experience है। पिछले सर्दियों में, मैं  6:00 AM se 6:00 PM की शिफ्ट की थी जब सुबह- सुबह बाइक से काम पर जाता था, तो अक्सर सड़क पर किसी न किसी पिल्ले का शव मिलता था। सुबह-सुबह ऐसा भयानक नज़ारा देखना पूरे दिन दिमाग में घूमता रहता था।




सड़क पर ये मासूम बच्चे इसलिए मरते हैं क्योंकि:
  • सुरक्षा का अभाव: फीमेल डॉग को खाना ढूंढने के लिए भटकना पड़ता है, इसलिए वह बच्चों को सुरक्षित नहीं रख पाती।
  • इंसानी बेरुखी: लोग इन पिल्लों को गंदगी फैलाने वाला मानकर डंडे मारते हैं और घरों से भगा देते हैं।
  • सड़क की तपिश: ठंड से बचने के लिए ये पिल्ले सीमेंट वाली सड़कों पर सोते हैं, जो दिन की गर्मी सोखने के कारण रात में गरम रहती हैं। यहीं तेज रफ्तार गाड़ियां उन्हें कुचल देती हैं।

खिलौना बनाकर फेंक देना: एक कड़वा सच

सबसे दुखद यह है कि बच्चे इन पिल्लों को खेल-खेल में घर ले आते हैं, लेकिन घरवाले उन्हें रखने नहीं देते। अंत में, वे पिल्ले अपनी माँ से दूर होकर सड़कों पर भूखे घूमते हैं। उन्हें नहीं पता होता कि भोजन कहाँ से मिलेगा। कई बार मैंने अपनी आँखों से उन्हें इंसानी मल (Poop) खाते देखा है। वे इंसानों को देखते ही भाग जाते हैं, क्योंकि वो इंसान से डरते इंसान उनको पता हैं कि इंसान केवल उन्हें परेशान करेंगे।

baby dogs

(ऊपर दी गई photo मैंने अपने mobile से ली है इस में कुछ baby dogs इंसान माल खा रहे हैं। )

सरकार और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

यह समस्या सालों से चली आ रही है और हम सब इसे देख रहे हैं, लेकिन अपनी जिंदगी की भागदौड़ में हम इसे नजरअंदाज कर देते हैं। हमारे पास अपने सबसे पुराने वफादार दोस्त की पीड़ा देखने का समय ही नहीं है।

हमारा क्या फर्ज है?

  1. ​नसबंदी (Sterilization): आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए यह सबसे मानवीय तरीका है।
  2. शैलटर्स (Shelters) की मांग: अगर सरकार गौशाला बना सकती है, तो इन बेजुबान कुत्तों के लिए शेल्टर क्यों नहीं?
  3. संवेदनशीलता: सरकार विज्ञापन और अन्य खर्चों में करोड़ों बर्बाद करती है, क्या कुछ हिस्सा इन जीवों की सुरक्षा के लिए नहीं हो सकता?
हमने और हमारे पूर्वजों ने न जाने कितनी प्रजातियाँ खत्म कर दी हैं। क्या अब वक्त नहीं आ गया कि हम थोड़ी हिम्मत दिखाएं? क्या सरकारें सिर्फ उन्हीं जानवरों की मदत करेगी जिनसे वोट मिलता है?


कुत्ते इंसान के बारे में क्या सोचते हैं?

वैज्ञानिक शोध जैसे Neuroimaging Studies यह स्पष्ट करती हैं कि कुत्ते हमें सिर्फ खाने के वाले मालिक के रूप में नहीं देखते। एमोरी यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में पाया गया कि कुत्तों के दिमाग का Caudate Nucleus हिस्सा, जो खुशी और इनाम से जुड़ा है, अपने मालिक की गंध मिलने पर वैसे ही सक्रिय हो जाता है जैसे किसी प्रियजन को देखकर इंसान का होता है।
​कुत्ते इंसानों को अपने परिवार (Pack) का हिस्सा मानते हैं। शोध बताते हैं कि कुत्ते किसी भी अन्य जानवर की तुलना में इंसानी इशारों को बेहतर समझते हैं। वे हमारी आंखों की पुतलियों और आवाज के लहजे से हमारी भावनाओं को पढ़ लेते हैं। जब आप अपने कुत्ते या किसी जान-पहचान वाले स्ट्रीट डॉग से बात करते हैं, तो वे आपकी आवाज के उतार-चढ़ाव से यह समझ जाते हैं कि आप उन्हें प्यार दे रहे हैं या गुस्सा हैं। वे हमें एक सुरक्षा कवच के रूप में देखते हैं, जिसके पास वे घबराहट में जाकर सुरक्षित महसूस करते हैं। सीधा मतलब यह है , कुत्ते हमें अपने जीवन का आधार और भावनात्मक साथी मानते हैं।
​यह रिश्ता केवल वफादारी नहीं, बल्कि एक गहरा जैविक जुड़ाव है, जिसे हम अपनी व्यस्तता में अक्सर अनदेखा कर देते हैं।

सरकारी रिपोर्ट कितने % dogs के बच्चे 3 महीने से ज्यादा जीते है।  

आंकड़ों और वैज्ञानिक शोध के आधार पर यहाँ आपके सवालों के जवाब दिए गए हैं:
कितने dogs जन्म के बाद 3 महीने से कम जीते है।  

आधिकारिक तौर पर, भारत के शहरी क्षेत्रों में आवारा कुत्तों (Street Dogs) की 'पिल्ला मृत्यु दर' (Puppy Mortality Rate) बहुत अधिक है। विभिन्न पशु कल्याण संगठनों और शोध अध्ययनों के अनुसार, सड़क पर पैदा होने वाले लगभग 70% से 80% पिल्ले अपने जीवन के पहले 3 से 6 महीनों के भीतर मर जाते हैं। वे अक्सर संक्रमण (जैसे पार्वो वायरस), भूख, गाड़ियों के नीचे आने या कुपोषण का शिकार होते हैं। यह स्थिति बताती है कि केवल 20% से 30% ही वयस्कता तक पहुँच पाते हैं। यह एक बहुत ही भयावह वास्तविकता है जो हमारे शहरी प्रबंधन और मानवीय संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़ा करती है।

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