PTSD क्या है? और PTSD मे fight-or-flight mode कब ON होता है !
Post-Traumatic Stress Disorder (PTSD) क्या है? और PTSD मे fight-or-flight mode कब ON होता है!
ज़िंदगी में हम सब कभी न कभी किसी न किसी डर, हादसे या सदमे से गुजरते हैं। ज़्यादातर समय, हम उस बुरे वक्त को पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं। हमारा दिमाग वक्त के साथ उन पुरानी कड़वी यादों पर धूल की एक परत चढ़ा देता है, ताकि हम अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी आराम से जी सकें। लेकिन क्या हो अगर वह बुरी याद गुज़रा हुआ कल न बनकर आपका 'आज' बन जाए? क्या हो अगर आपका दिमाग यह मानने से ही इनकार कर दे कि खतरा टल चुका है?
जब ऐसा होता है, तो उसे मनोविज्ञान की भाषा में पीटीएसडी (PTSD) यानी पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर कहा जाता है। यह कोई कमज़ोरी नहीं है, और न ही यह कोई ऐसी चीज़ है जिसे इंसान जानबूझकर महसूस करता है। यह असल में हमारे दिमाग की एक बहुत ही पेचीदा और प्राकृतिक प्रणाली के 'खराब' हो जाने का नतीजा है। इस प्रणाली को हम 'फाइट या फ्लाइट' मोड कहते हैं। इसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा, उन दिनों में जब इंसान जंगलों में रहा करता था।
'फाइट या फ्लाइट' मोड: हमारे शरीर का इमरजेंसी सायरन
ज़रा कल्पना कीजिए कि आप एक घने जंगल में अकेले चल रहे हैं और अचानक आपके सामने एक खूंखार शेर आ जाता है। उस एक पल में, आपके पास सोचने या योजना बनाने का कोई समय नहीं होता। उस वक्त आपका दिमाग एक सेकंड के हज़ारवें हिस्से में आपके शरीर का 'इमरजेंसी सायरन' बजा देता है। इसी सायरन को 'फाइट या फ्लाइट' (लड़ो या भागो) मोड कहा जाता है।
जैसे ही यह मोड ऑन होता है, आपके शरीर में कुछ बहुत ही जादुई और तेज़ बदलाव होते हैं। आपका दिमाग एड्रेनालाईन (Adrenaline) नाम का एक हार्मोन छोड़ता है। यह हार्मोन आपके शरीर में बिजली की तरह दौड़ जाता है। आपका दिल बहुत ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगता है ताकि आपकी मांसपेशियों तक ज़्यादा से ज़्यादा खून और ऑक्सीजन पहुंच सके। आपकी सांसें तेज़ हो जाती हैं। आपकी पुतलियां फैल जाती हैं ताकि आपको सब कुछ साफ़ और दूर तक दिखाई दे। उस वक्त आपके शरीर की वो सारी प्रक्रियाएं जो तुरंत ज़रूरी नहीं हैं—जैसे खाना पचाना (पाचन तंत्र)—पूरी तरह से रोक दी जाती हैं। आपके शरीर की सौ प्रतिशत ऊर्जा सिर्फ एक काम के लिए लगा दी जाती है: या तो उस शेर से लड़ो (Fight) या फिर वहां से पूरी ताकत लगाकर भाग जाओ (Flight)।
यह प्रणाली प्रकृति का दिया हुआ एक सुरक्षा कवच है। यह हमें ज़िंदा रखने के लिए डिज़ाइन किया गया है। जब खतरा टल जाता है, तो हमारा दिमाग एक और सिग्नल भेजता है कि "सब ठीक है, अब शांत हो जाओ।" और हमारा शरीर वापस अपनी सामान्य स्थिति में लौट आता है।
PTSD: जब अलार्म 'ऑफ' होना भूल जाए
अब मुख्य मुद्दे पर आते हैं। पीटीएसडी तब होता है जब कोई बहुत बड़ा सदमा (जैसे कोई भयानक एक्सीडेंट, युद्ध, प्राकृतिक आपदा या कोई बहुत बड़ा भावनात्मक आघात) आपके दिमाग पर इतना गहरा असर डालता है कि आपका 'फाइट या फ्लाइट' वाला अलार्म बंद होना ही भूल जाता है।
घटना गुज़र चुकी होती है। आप अपने घर के सुरक्षित कमरे में बैठे होते हैं। लेकिन आपके दिमाग को अभी भी लगता है कि "शेर सामने ही खड़ा है।" वह इमरजेंसी मोड कभी ऑफ ही नहीं होता। एक छोटी सी आवाज़, पीछे से किसी का पुकारना, या कोई खास गंध भी उस अलार्म को फिर से ट्रिगर कर देती है। इंसान को फ्लैशबैक आते हैं, जो महज़ यादें नहीं होते, बल्कि व्यक्ति को ऐसा लगता है जैसे वह उस भयानक पल को इस वक्त, इसी पल दोबारा जी रहा है। उसका दिल वैसे ही धड़कता है, उसे वैसा ही पसीना आता है और वह वैसा ही खौफ महसूस करता है। उसका दिमाग वर्तमान और अतीत के बीच का फर्क भूल जाता है।
क्या जानवरों में भी PTSD और 'फाइट या फ्लाइट' मोड होता है?
यह एक बहुत ही दिलचस्प और भावुक कर देने वाला सवाल है। इसका सीधा सा जवाब है: हाँ, बिल्कुल होता है। असल में, 'फाइट या फ्लाइट' प्रणाली इंसानों और जानवरों दोनों में एक समान रूप से काम करती है। हमारे और जानवरों के दिमाग का वह हिस्सा जो डर को महसूस करता है (जिसे लिम्बिक सिस्टम कहते हैं), लगभग एक जैसा ही होता है।
आपने गली के कुत्तों को देखा होगा। अगर किसी कुत्ते को किसी इंसान ने लाठी से बुरी तरह पीटा है, तो अगली बार जब कोई भला इंसान भी उसे प्यार से पुचकारने के लिए हाथ उठाएगा, तो वह कुत्ता डर से कांपने लगेगा। वह या तो गुर्राएगा और काटने दौड़ेगा (Fight), या फिर दुम दबाकर वहां से भाग जाएगा (Flight)।
जानवरों में एक तीसरा रिस्पॉन्स भी होता है जिसे 'फ्रीज़' (Freeze) कहा जाता है। जब जानवर को लगता है कि खतरा इतना बड़ा है कि न तो वह लड़ सकता है और न ही भाग सकता है, तो वह पूरी तरह से सुन्न होकर जम जाता है। यह अक्सर उन जानवरों में देखा जाता है जो बहुत भयानक परिस्थितियों से निकाले गए हों, जैसे भूकंप के मलबे से बचे जानवर या कसाईखाने से बचाए गए पशु। तेज़ आवाज़ें जैसे दिवाली के पटाखे भी अक्सर जानवरों में पीटीएसडी को ट्रिगर कर देते हैं। उनके लिए वह आवाज़ किसी बहुत बड़े खतरे का संकेत होती है, और वे हफ्तों तक सदमे में रह सकते हैं।
अटके हुए मोड को वापस 'ऑफ' कैसे किया जाता है?
यह समझना बहुत ज़रूरी है कि कोई भी व्यक्ति जो पीटीएसडी से जूझ रहा है, वह जानबूझकर ऐसा नहीं कर रहा है। उसका दिमाग एक लूप में फंसा हुआ है। लेकिन अच्छी खबर यह है कि विज्ञान और मनोविज्ञान के पास इस अटके हुए स्विच को वापस 'ऑफ' करने के बहुत ही प्रभावी तरीके हैं। आइए जानते हैं कि इंसानों के मामले में इस सिस्टम को कैसे शांत किया जाता है:
- ग्राउंडिंग तकनीक (Grounding Techniques): जब दिमाग किसी पुराने फ्लैशबैक में फंसा होता है, तो उसे यह याद दिलाना ज़रूरी होता है कि वह 'अभी और यहां' (Present moment) में है। इसके लिए 5-4-3-2-1 तकनीक का बहुत इस्तेमाल होता है। व्यक्ति से कहा जाता है कि वह अपने आस-पास मौजूद 5 चीज़ों को देखे, 4 चीज़ों को छुए, 3 चीज़ों की आवाज़ सुने, 2 चीज़ों को सूंघे और 1 चीज़ का स्वाद ले। इससे दिमाग तुरंत 'खतरे वाले अतीत' से निकलकर 'सुरक्षित वर्तमान' में आ जाता है।
- शारीरिक प्रतिक्रिया को शांत करना (Somatic Soothing): 'फाइट या फ्लाइट' मोड शरीर में अटका होता है, इसलिए शरीर को शांत करना पहला कदम है। गहरी और धीमी सांसें लेना (जैसे 4 सेकंड में सांस लेना, 4 सेकंड रोकना और 6 सेकंड में छोड़ना) दिमाग की वेगस नर्व (Vagus nerve) को सीधा संदेश भेजता है कि "मैं सुरक्षित हूँ, अब अलार्म बंद कर दो।"
- ईएमडीआर थेरेपी (EMDR - Eye Movement Desensitization and Reprocessing): यह पीटीएसडी के लिए एक बहुत ही जादुई और वैज्ञानिक तरीका है। इसमें एक प्रशिक्षित थेरेपिस्ट व्यक्ति की आंखों की गति का इस्तेमाल करता है। जब व्यक्ति उस बुरी घटना के बारे में सोचता है, तो थेरेपिस्ट उसकी आंखों को दाएं-बाएं मूव करवाता है (जैसे नींद के दौरान हमारी आंखें मूव करती हैं)। यह प्रक्रिया दिमाग के उस अटके हुए हिस्से को खोलती है और दिमाग को उस सदमे को सही तरीके से 'प्रोसेस' करने में मदद करती है, ताकि वह घटना सिर्फ एक साधारण याद बनकर रह जाए, न कि कोई खौफनाक फ्लैशबैक।
- कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT): इस थेरेपी में इंसान को धीरे-धीरे यह सिखाया जाता है कि हर तेज़ आवाज़ या हर पुरानी याद का मतलब खतरा नहीं है। व्यक्ति अपने डर के ट्रिगर्स को पहचानना और उनके प्रति अपनी प्रतिक्रिया को बदलना सीखता है। यह दिमाग की नई वायरिंग (Rewiring) करने जैसा है।
- सुरक्षित माहौल और अपनों का साथ: कोई भी थेरेपी तब तक काम नहीं कर सकती जब तक इंसान को यह महसूस न हो कि वह एक सुरक्षित जगह पर है। परिवार और दोस्तों का बिना किसी जजमेंट के साथ होना उस अलार्म को हमेशा के लिए बंद करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है। प्यार और सुरक्षा की भावना दिमाग के उस हिस्से को शांत करती है जो लगातार खतरे की घंटी बजा रहा होता है।

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