भारत का कानून व्यवस्था सिर्फ गरीबों को सताने के लिए है अमीरों के लिये कानून एक मजाक है !
क्या भारत में कानून सबके लिए एक है? यह सवाल तब और गहरा हो जाता है हमारे देश में दो कानून है एक अमीर के लिए एक गरीब के लिए केसे ये आप इस आर्टिकल को पढ़कर समझ जाएंगे !
हमरे देश में सबसे ज्यादा पॉपुलर sport है cricket और अभी ipl चल रहा है!
आईपीएल (IPL) सिर्फ एक क्रिकेट लीग नहीं है, यह भारत का सबसे बड़ा त्योहार है। करोड़ों की चकाचौंध, चीयरलीडर्स, सट्टेबाजी और रातों-रात करोड़पति बनते खिलाड़ी। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक ऐसा कड़वा सच छिपा है, जो हमारे देश के कानून, न्याय व्यवस्था और समाज के दोहरे चरित्र (Double Standards) को पूरी तरह से नंगा कर देता है। Live
Vape smoke ban in india
हाल ही में आईपीएल के दौरान एक ऐसी घटना हुई जिसने कई सवाल खड़े कर दिए। राजस्थान रॉयल्स के कप्तान रियान पराग को लाइव टीवी पर ड्रेसिंग रूम के अंदर वेप (Vape / E-Cigarette) पीते हुए देखा गया।
अब यहाँ एक बहुत ही बारीक, लेकिन जरूरी बात समझने वाली है।
अगर कोई खिलाड़ी ड्रेसिंग रूम में सिगरेट पीता है, तो यह बीसीसीआई (BCCI) के नियमों का उल्लंघन है। बीसीसीआई एक स्वतंत्र संस्था (Independent Body) है। वह उस खिलाड़ी पर जुर्माना लगाए, उसे बैन करे, या कुछ न करे—यह पूरी तरह से उनका अंदरूनी मामला है। भारत में सिगरेट पीना कानूनी रूप से अपराध नहीं है (सार्वजनिक स्थानों को छोड़कर)।
लेकिन रियान पराग सिगरेट नहीं, 'वेप' (Vape) पी रहे थे। भारत सरकार ने साल 2019 में ही 'Prohibition of Electronic Cigarettes Act' लागू कर दिया था। इस कानून के तहत भारत में ई-सिगरेट (Vapes) का उत्पादन, निर्माण, आयात, निर्यात, परिवहन, बिक्री और वितरण पूरी तरह से बैन (Ban) है। * कानूनी सजा: अगर कोई आम आदमी पहली बार इस कानून को तोड़ता है, तो उसे 1 साल की जेल या 1 लाख रुपये का जुर्माना (या दोनों) हो सकता है।
दूसरी बार पकड़े जाने पर: 3 साल की जेल और 5 लाख रुपये का जुर्माना।
लेकिन इस मामले में क्या हुआ? बीसीसीआई ने रियान पराग पर उनकी मैच फीस का 25% जुर्माना लगाकर मामला रफा-दफा कर दिया।
जरा सोचिए... जिस खिलाड़ी को आईपीएल से करोड़ों रुपये मिल रहे हैं, उसके लिए एक मैच की फीस का 25% या फिर सरकार का 1 लाख रुपये का जुर्माना क्या मायने रखता है? रियान पराग जैसे करोड़पति इंसान के लिए 1 लाख रुपये कुछ भी नहीं हैं।
लेकिन एक आम आदमी के नजरिए से देखिए। एक साधारण इंसान को 1 लाख रुपये बचाने में सालों की खून-पसीने की मेहनत लग जाती है। असल में, यह कानून सिर्फ और सिर्फ गरीबों के लिए है। एक गरीब आदमी तो इसे पीने से पहले सौ बार डरेगा कि "अगर पकड़ा गया तो 1 लाख रुपये कहाँ से दूँगा? जेल जाना पड़ेगा।" लेकिन अमीरों को कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्हें पता है कि सजा तो होनी नहीं है, और अगर पकड़े भी गए, तो 1 लाख रुपये देकर आसानी से बच जाएंगे। उनके लिए यह जुर्माना कोई सजा नहीं, बस अपराध करने की एक छोटी सी 'फीस' है।
असली सवाल ये हैं जो किसी ने नहीं पूछे:
जब भारत में वेप बेचना और खरीदना पूरी तरह से बैन है, तो यह वेप आईपीएल के हाई-सिक्योरिटी ड्रेसिंग रूम तक पहुंचा कैसे?
इसे किसने सप्लाई किया? क्या पुलिस या नारकोटिक्स विभाग ने इसकी कोई जांच की?
अगर एक आम आदमी, जो दिन के 400 रुपये दिहाड़ी कमाता है, उसके हाथ में वेप मिल जाए तो पुलिस उसे तुरंत जेल में डाल देगी और 1 लाख का जुर्माना लगा देगी। लेकिन एक करोड़पति क्रिकेटर के लिए कानून इतना नरम क्यों?
क्या 1 लाख रुपये का जुर्माना रियान पराग जैसे इंसान के लिए कोई सजा है? आर्थिक दंड हमेशा व्यक्ति की हैसियत के हिसाब से (Percentage of Net Worth) होना चाहिए, न कि एक फिक्स अमाउंट। वरना जुर्माना सिर्फ अमीरों के लिए अपराध करने की 'फीस' बनकर रह जाएगा।
सबसे डरावनी बात यह है कि उसी ड्रेसिंग रूम में और उसी टीम के साथ 15 साल के युवा बच्चे भी बैठे हैं। हम उन्हें क्या सिखा रहे हैं?
What is the punishment for child Labour in India?
इसी आईपीएल में वैभव सूर्यवंशी (Vaibhav Suryavanshi) नाम का एक 15 साल का बच्चा भी खेल रहा है। हर जगह मीडिया में इसकी तारीफ हो रही है। लेकिन क्या हमने कभी इसके कानूनी पहलू पर गौर किया है?
भारत सरकार के 'बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम' (Child Labour Act) के तहत 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम करवाना अपराध है, और 14 से 18 साल के किशोरों (Adolescents) से खतरनाक उद्योगों में काम नहीं करवाया जा सकता।
अगर कोई 15 साल का बच्चा 'अंडर-15' (Under-15) या 'अंडर-19' (Under-19) खेलता है, या नेशनल टीम में देश को रिप्रजेंट करता है, तो वह एक अलग बात है। वह देश के लिए खेल रहा है। लेकिन आईपीएल कोई राष्ट्रीय खेल नहीं है; यह एक प्राइवेट कमर्शियल लीग (Private Commercial League) है। यह पूरी तरह से पैसे, मनोरंजन और व्यापार के लिए है।
अगर वैभव सूर्यवंशी पैसों के लिए एक प्राइवेट कंपनी (फ्रेंचाइजी) के लिए काम कर रहा है, तो तकनीकी रूप से क्या यह बाल मजदूरी (Child Labor) के दायरे में नहीं आता? क्या फिल्मों और टीवी सीरियल्स में काम करने वाले छोटे बच्चे, जो 12-12 घंटे शूटिंग करते हैं, बाल मजदूर नहीं हैं?
समाज और सरकार का तर्क होता है कि यह "आर्ट" है, यह "स्पोर्ट्स" है, यह उनके भविष्य के लिए अच्छा है। बहुत अच्छी बात है। लेकिन यह रियायत सिर्फ अमीरों, टैलेंटेड और टीवी पर दिखने वाले बच्चों के लिए ही क्यों है?
kadwa sach
इस भेद भाव को समझने के लिए आपको मैं एक कहानी बताता हूँ।
एक दिन मैं अपनी बाइक से जा रहा था। रास्ते में एक पुल के पास मैंने बाइक रोकी। वहीं किनारे पर दो बच्चे बेठे थे। एक की उम्र करीब 15 साल और दूसरे की 16 साल होगी। दोनों अपने हाथों से भांग रगड़ रहे थे।
मैंने उनसे पूछा, "क्या तुम लोग इसे पीते हो? इतने छोटे होकर ये नशे क्यों कर रहे हो?"
उनमें से एक ने बड़ी मासूमियत से कहा, "नहीं भैया, हम पीते नहीं हैं, हम इसे बेचते हैं।"
मैंने हैरान होकर पूछा, "किसको बेचते हो?"
उसने सड़क की तरफ इशारा करते हुए कहा, "यहाँ से जो ट्रक वाले गुजरते हैं, वो खरीद लेते हैं।"
"कितने पैसे मिल जाते हैं दिन भर में?"
"300 से 400 रुपये बन जाते हैं।"
मुझे थोड़ा गुस्सा भी आया और तरस भी। मैंने कहा, "इतनी मेहनत तुम यहाँ धूप में कर रहे हो, कहीं कोई ढंग का काम क्यों नहीं कर लेते? किसी दुकान या फैक्ट्री में काम मांग लो।"
उस 16 साल के बच्चे ने जो जवाब दिया, उसने मुझे अंदर तक झकझोर कर रख दिया।
उसने कहा, "भैया, हमें कोई काम नहीं देता। सब बोलते हैं कि तुम नाबालिग हो। अगर पुलिस आ गई तो क्या मेरी दुकान बंद करवाओगे? किसी कंपनी में भी काम नहीं मिलता, उम्र काम है।"
मैंने पूछा, "तुम्हारे माता-पिता क्या करते हैं?"
उसने कहा, "पापा मर गए हैं। हम दोनों भाई हैं। दो बहनें भी हैं। माँ भैंस के लिए घास काट कर लाती है। घर के खर्च का जुगाड़ और पेट भरने के लिए हमें यही सब करना पड़ता है। जब ये भांग खत्म हो जाती है, तो हम कूड़ा बीनते हैं, खाली बोतलें चुनते हैं।"
मैं उन बच्चों को देख रहा था। उनके चेहरे पर जो थकान और संघर्ष था, वो किसी कॉर्पोरेट कंपनी में दिन भर काम करने वाले मजदूर से कम नहीं था। वो बच्चा दिन-रात मेहनत कर रहा है, फिर भी उसे दो वक्त का अच्छा खाना नसीब नहीं होता।
कानून और समाज का दोगलापन
मैं भी मानता हूँ कि बाल मजदूरी गलत है। बच्चों के हाथ में किताब होनी चाहिए, काम के औजार नहीं।
लेकिन
जब वैभव सूर्यवंशी आईपीएल खेलता है, या किसी अमीर का बच्चा टीवी पर विज्ञापन करता है, तो हम ताली बजाते हैं। कोई पुलिसवाला जाकर उस डायरेक्टर या फ्रेंचाइजी ओनर को गिरफ्तार नहीं करता। क्योंकि उनके माँ-बाप गरीब नहीं हैं, उन्हें मजबूरी में काम नहीं करना पड़ रहा है।
लेकिन जब एक गरीब, अनाथ बच्चा, जिसकी माँ के पास खिलाने को पैसे नहीं हैं, वह किसी चाय की दुकान पर काम मांगता है, तो पूरा समाज एक्टिविस्ट बन जाता है। पुलिस, नेता, एनजीओ (NGO), न्यूज चैनल... सबको अचानक बाल मजदूरी याद आ जाती है।
जब वो बच्चा चाय की दुकान पर कप धोकर दिन के 100 रुपये कमा रहा होता है, तो लोग चाय वाले को धमकाते हैं कि "इसे निकालो, वरना हम पुलिस बुलाएंगे।" नतीजा क्या होता है? वो चाय वाला डर के मारे उस 'छोटू' को निकाल देता है।
क्या उस पुलिसवाले ने, उस एनजीओ वाले ने, या उस समाज सुधारक ने उस बच्चे की जिम्मेदारी ली? क्या किसी ने उसके स्कूल की फीस भरी? क्या किसी ने उसके घर राशन भिजवाया? नहीं। उन्होंने सिर्फ कानून का डंडा चलाकर उस बच्चे से उसकी नौकरी छीन ली। और जब उस बच्चे को कहीं सम्मान की रोटी कमाने का हक नहीं मिलता, तब वह मजबूरी में या तो ट्रक वालों को भांग बेचता है, या कूड़ा बीनता है, या फिर चौराहों पर भीख मांगने को मजबूर हो जाता है।
भारत एक देश, दो दुनिया
हम एक ऐसे देश में जी रहे हैं जहाँ न्याय अंधा नहीं है; न्याय ने अमीरों के लिए चश्मा और गरीबों के लिए पट्टी बांधी हुई है।
अगर आप मशहूर हैं, आपके पास करोड़ों रुपये हैं, तो आप लाइव टीवी पर नेशनल लॉ (National Law) तोड़कर बैन ई-सिगरेट पी सकते हैं और सिर्फ अपनी एक दिन की कमाई का 25% देकर साफ बच सकते हैं। कोई आपसे नहीं पूछेगा कि माल कहाँ से आया।
अगर आप किसी रसूखदार परिवार से हैं, तो आपका 15 साल का बच्चा कमर्शियल लीग में खेलकर करोड़ों कमा सकता है और उसे 'स्पोर्ट्स' का नाम दिया जाएगा।
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लेकिन अगर आप गरीब हैं, अनाथ हैं, और सिर्फ अपनी भूखी बहनों और माँ का पेट पालने के लिए किसी ढाबे पर मेहनत की रोटी कमाना चाहते हैं... तो यह देश आपको 'बाल मजदूर' कहकर खदेड़ देगा। यह सिस्टम आपको मेहनत करने की इजाजत नहीं देगा, लेकिन आपको कूड़ा बीनने या भीख मांगने के लिए लावारिस छोड़ देगा।
कानून का काम लोगों की रक्षा करना होना चाहिए, उन्हें लाचार बनाना नहीं। जब तक यह दोहरा मापदंड खत्म नहीं होगा, तब तक टीवी स्क्रीन पर दिखने वाला 'शाइनिंग इंडिया' और पुल के नीचे भांग बेचने वाले भारत के बीच की खाई कभी नहीं भरेगी।

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