हमें सपने क्यों आते हैं? सपनों का मनोविज्ञान और Sigmund Freud की रहस्यमयी थ्योरी
हमें सपने क्यों आते हैं? आपकी रातों के पीछे छुपी एक हैरतअंगेज कहानी
कल रात... यादों का एक सिलसिला, एक बेहद भयानक ख्वाब, या शायद एक नर्म सा अहसास आपकी आंखों के पीछे 'प्ले' हो रहा था। आपने सोचा होगा कि ये सब बस दिमाग की 'बकवास' है? अगर मैं कहूं कि हर सपना एक 'रास्ता' है, एक छुपी हुई तिजोरी की चाबी... तो?
सही सुना आपने दोस्तों! हम अपनी जिंदगी का एक-तिहाई (one-third) हिस्सा सोते हुए गुजार देते हैं, और उस समय में सबसे बड़ा रहस्य जो हमारे दिमाग ने छुपा रखा है, वो है सपने। हमें सपने क्यों आते हैं? यह सवाल सदियों से इंसानी दिमाग को खटक रहा है। चलिए, आज इस रहस्य से पर्दा उठाते हैं, और उस गहरे मनोविज्ञान (Psychology) को समझते हैं जो आपको आपके असली रूप से मिलवाएगी।
रातों के पर्दे के पीछे का खेल
आप कभी किसी ऐसे सपने से जागे हैं, जहां आप ऊंचाई से गिर रहे थे, लेकिन जमीन से टकराने से ठीक पहले आंख खुल गई? या शायद आप अपनी ही मौत देख रहे थे? ये अनुभव इतने 'असली' लगते हैं कि इनका असर अगले कई घंटों तक रहता है। इस अहसास के पीछे दिमाग में एक पूरा स्क्रिप्ट चल रहा होता है, जिसे पढ़ने वाला एकदम दंग रह जाए।
सपने दिमाग के बंद होने का सबूत नहीं हैं; ये उसकी सबसे क्रिएटिव और एक्टिव अवस्था है जब हम 'ऑफलाइन' होते हैं। और इस पूरे खेल को सबसे पहले एक महान मनोवैज्ञानिक ने सबसे बेहतरीन ढंग से दुनिया के सामने रखा था।
सिगमंड फ्रायड की 'विश फुलफिलमेंट' थ्योरी
दोस्तों, जब सपनों की साइकोलॉजी की बात हो, तो सबसे पहली सलामी डॉक्टर सिगमंड फ्रायड को जाती है। फ्रायड ने एक क्रांतिकारी बात कही थी – सपने सिर्फ दिमाग का शोर नहीं हैं, ये हमारी दबी हुई इच्छाओं (unconscious desires) को पूरा करने का एक 'शॉर्टकट' हैं।
उनका मानना था कि हम अपनी सामाजिक जिंदगी में कई ऐसी बातें और भावनाओं को दबा कर रखते हैं, जिन्हें हम असल जिंदगी में पूरा नहीं कर सकते। ये दबी हुई बातें हमारे अवचेतन मन में एक तिजोरी की तरह बंद रहती हैं। सपने उस तिजोरी के दरवाजे हैं जहां हम अपनी हर दबी हुई इच्छा को पूरा होते हुए देखते हैं।
लेकिन फ्रायड ने एक और मज़ेदार बात कही: "दिमाग इतना होशियार है कि वो आपकी दबी हुई इच्छाओं को सीधे-सीधे सपने में नहीं दिखाता। वो उसे प्रतीकों (Symbols) के पर्दे में लपेट कर दिखाता है।" यानी सपने में आप जो देखते हैं और उसका जो असली मतलब होता है, वो दोनों बहुत अलग हो सकते हैं।
फ्रायड का "व्हाइट डॉग" केस: एक कहानी
फ्रायड के पास एक मरीज था – चलिए उसका नाम 'फ्रांज़' मान लेते हैं। फ्रांज़ अपनी फैमिली से बहुत प्यार करने वाला एक शांत इंसान था। लेकिन उसको एक बार एक ऐसा भयानक सपना आया जिसे सुनकर वो कांप उठा।
सपने में फ्रांज़ देखता है कि उसके सामने एक बेहद सुंदर, सफेद रंग का कुत्ता (White Dog) खड़ा है। फ्रांज़ उसे देखकर खुश नहीं हुआ, बल्कि उसके अंदर एक अजीब सा गुस्सा भड़क उठा। उसने आव देखा न ताव और उस प्यारे सफेद कुत्ते का गला घोंट (Strangling) दिया। कुत्ते के मरते ही फ्रांज़ की नींद खुल गई, वो पसीने-पसीने था और उसके मन में एक 'खूनी' वाली फीलिंग आ रही थी।
फ्रांज़ बहुत परेशान था, वो तो जानवरों से प्यार करता था, फिर उसने ऐसा सपना क्यों देखा? वो फ्रायड के पास गया और अपना रोना रोया।
फ्रायड का साइकोलॉजिकल एनालिसिस
यहाँ पर फ्रायड ने अपना जादुई दिमाग लगाया। उन्होंने फ्रांज़ से उस कुत्ते के बारे में और गहराई से बात की। फ्रांज़ ने बताया कि वो कुत्ता बहुत आज्ञाकारी, शांत और वफादार था।
फ्रायड ने कड़ियाँ जोड़ीं। फ्रांज़ की एक चाची (Aunt) थीं, जिन्हें फ्रांज़ बहुत इज्जत देता था। लेकिन वो औरत बहुत हुक्म चलाने वाली थी और फ्रांज़ की पूरी जिंदगी को कंट्रोल करती थी। फ्रांज़ उनके अहसानों के नीचे दबा हुआ था।
अब ध्यान से सुनिए! फ्रायड ने खुलासा किया कि वो सुंदर, सफेद कुत्ता असल में उसकी चाची का प्रतीक (Symbol) था।
फ्रांज़ असल जिंदगी में अपनी चाची पर गुस्सा नहीं निकाल सकता था क्योंकि समाज और संस्कार इसकी इजाजत नहीं देते। उसने अपने इस गुस्से को दबा रखा था। सपने ने फ्रांज़ के दिमाग को वो 'शॉर्टकट' दिया। फ्रांज़ के उस दबे हुए गुस्से ने सपने में उस 'वफादार कुत्ते' को मार डाला। इस तरह उसने अपनी चाची के प्रति नफरत को सपने में रिलीज कर दिया।
यह सच जानकर फ्रांज़ हैरान रह गया। वो समझ गया कि उसका दिमाग उसे कोई पागल इंसान नहीं बना रहा था, बल्कि दबे हुए तनाव को बाहर निकाल रहा था।
सोचिए जरा: क्या आपने भी कभी कोई ऐसा अजीब सपना देखा है, जिसका कोई मतलब ही समझ न आ रहा हो, पर उठने के बाद दिल घबरा रहा हो? उस सपने के किसी एक 'प्रतीक' को याद करने की कोशिश कीजिए...
कार्ल जुंग का नजरिया: जब आपका अवचेतन मन बात करता है
फ्रायड के एक बहुत होनहार चेले थे – कार्ल जुंग (Carl Jung)। लेकिन आगे चलकर जुंग ने फ्रायड की 'सिर्फ दबी हुई इच्छाओं' वाली बात से असहमति जताई। जुंग ने कहा कि सपने सिर्फ हमारी गंदी या छुपी हुई इच्छाओं का डस्टबिन नहीं हैं। सपने तो असल में हमारे अवचेतन मन (Subconscious mind) का हमसे बात करने का जरिया हैं!
जुंग का मानना था कि हमारा दिमाग सपने के जरिए हमें वो सच दिखाने की कोशिश करता है जो हम जागते हुए नजरअंदाज कर देते हैं। मान लीजिए आप असल जिंदगी में किसी रिश्ते को जबरदस्ती खींच रहे हैं और अंदर ही अंदर घुट रहे हैं। सपने में शायद आप खुद को किसी पिंजरे में बंद देखेंगे। जुंग के हिसाब से, यह सपना आपकी किसी दबी हुई बुरी इच्छा को पूरा नहीं कर रहा, बल्कि आपको चेतावनी दे रहा है कि 'भाई! संभल जाओ, तुम आजाद होना चाहते हो।'
मॉडर्न साइंस का धमाका: थ्रेट सिमुलेशन थ्योरी (Threat Simulation Theory)
अब बात करते हैं आज के वैज्ञानिकों की। न्यूरोसाइंटिस्ट्स ने सपनों पर रिसर्च की और एक बहुत ही एंगेजिंग थ्योरी दी, जिसे 'थ्रेट सिमुलेशन थ्योरी' कहते हैं।
सोचिए, जब पायलट को प्लेन उड़ाना सिखाया जाता है, तो पहले उसे एक नकली 'सिम्युलेटर' (Simulator) मशीन में बिठाया जाता है ताकि वो बिना किसी खतरे के क्रैश होने से बचना सीख सके। वैज्ञानिकों का मानना है कि हमारा दिमाग भी सोते समय यही करता है!
जब आप सपने में किसी चोर से भाग रहे होते हैं, या किसी आफत में फंसे होते हैं, तो असल में आपका दिमाग आपको 'ट्रेनिंग' दे रहा होता है। वह रात के अंधेरे में एक वर्चुअल रियलिटी (VR) गेम खेल रहा होता है ताकि अगर असल जिंदगी में कभी ऐसा खतरा आए, तो आपका नर्वस सिस्टम उसके लिए पहले से तैयार रहे। यानी सपने आपको कमजोर नहीं, बल्कि असल जिंदगी के लिए मजबूत बनाने आते हैं।
दिमाग का कचरा साफ करना: मेमोरी कंसोलिडेशन (Memory Consolidation)
दिन भर में आप हजारों चीजें देखते हैं – किसी का चेहरा, कोई गाना, कोई टेंशन वाली बात, या कोई खूबसूरत नजारा। रात को जब आप सोते हैं, तो आपका दिमाग एक 'कंप्यूटर ऑपरेटर' की तरह काम करता है।
वो फालतू की यादों को डिलीट करता है और जो जरूरी यादें होती हैं, उन्हें शॉर्ट-टर्म मेमोरी से उठाकर लॉन्ग-टर्म मेमोरी के 'फोल्डर' में सेव करता है। इसी प्रोसेस (डाटा ट्रांसफर) के दौरान जो फाइलें स्क्रीन पर फ्लैश होती हैं, वही हमें सपनों के रूप में दिखाई देती हैं। इसीलिए कई बार सपने में आपको वो इंसान भी दिख जाता है जिससे आप सालों से नहीं मिले, क्योंकि दिमाग उसकी फाइल को री-अरेंज कर रहा होता है।
ल्यूसिड ड्रीमिंग (Lucid Dreaming): अपने सपनों के राजा बनिए!
क्या आप जानते हैं कि एक ऐसी भी कला है जिससे आप अपने सपनों को अपनी मर्जी से कंट्रोल कर सकते हैं? जी हां, इसे ल्यूसिड ड्रीमिंग कहते हैं।
यह वो अवस्था होती है जब आप सपना देख रहे होते हैं और अचानक सपने के अंदर ही आपको अहसास हो जाता है कि – "अरे! मैं तो सपना देख रहा हूँ!" जैसे ही आपको यह अहसास होता है, सपने का रिमोट कंट्रोल आपके हाथ में आ जाता है।
आप आसमान में उड़ सकते हैं, अपनी पसंदीदा कार चला सकते हैं, या किसी सुपरहीरो की तरह दुश्मनों से लड़ सकते हैं। साइकोलॉजी कहती है कि जो लोग इस कला को सीख लेते हैं, वो अपने दिमाग के डर और एंग्जायटी (तनाव) पर बहुत आसानी से काबू पा सकते हैं। यह दिमाग को हैक करने का सबसे बेहतरीन तरीका है!
तो आखिरकार निष्कर्ष क्या है?
चाहे वो Sigmund Freud की दबी हुई इच्छाएं हों, कार्ल जुंग का खुद से संवाद हो, या आज की साइंस की ट्रेनिंग – एक बात तो तय है। सपने बेमतलब नहीं होते। वो आपके दिमाग की गहराइयों का आईना हैं।
अगली बार जब आप कोई अजीब सा सपना देखकर उठें, तो उससे डरिएगा मत। आराम से बैठिए और सोचिए कि आपका दिमाग आपको क्या समझाने की कोशिश कर रहा है। हो सकता है आपके किसी उलझे हुए सवाल का जवाब उसी रहस्यमयी सपने में छुपा हो!
चलते-चलते: अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया और आप सपनों और माइंडसेट से जुड़े ऐसे ही मास्टरपीस साइकोलॉजिकल फैक्ट्स पढ़ना चाहते हैं, तो हमारे ब्लॉग को सब्सक्राइब करना न भूलें! कमेंट करके जरूर बताएं कि आपका सबसे यादगार सपना कौन सा था?
जी हाँ! हर स्वस्थ इंसान हर रात सपने देखता है, भले ही उसे सुबह उठकर वो याद न रहें। औसतन हम रात भर में 4 से 6 सपने देखते हैं।
जब हम सोते हैं, तो हमारा दिमाग यादें बनाने वाले न्यूरोट्रांसमीटर (जैसे नॉरपेनेफ्रिन) को बंद कर देता है। इसीलिए जागने के 5 मिनट के अंदर हम 50% और 10 मिनट में 90% सपना भूल जाते हैं।
कभी-कभार डरावने सपने आना सामान्य है (थ्रेट सिमुलेशन)। लेकिन अगर आपको रोज भयानक सपने आ रहे हैं और नींद खराब हो रही है, तो यह अत्यधिक तनाव, एंग्जायटी या किसी ट्रॉमा का संकेत हो सकता है। ऐसे में डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
साइंस भविष्य बताने वाले सपनों (Precognitive dreams) को मान्यता नहीं देता। विज्ञान कहता है कि हमारा अवचेतन मन दिन भर की घटनाओं से जो 'पैटर्न' और 'अनुमान' लगाता है, वही सपनों में दिखाई देते हैं। कई बार वो अनुमान सच हो जाते हैं और हमें लगता है कि सपना सच हो गया।
सपनों को याद रखने का सबसे बढ़िया तरीका है 'ड्रीम जर्नल' (Dream Journal) बनाना। जैसे ही आप सुबह उठें, बिना हिले-डुले सबसे पहले अपने सपने को एक डायरी में लिख लें। कुछ दिनों में आपका दिमाग सपनों को याद रखने लगेगा।

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